पादरी के शव दफनाने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: ‘कल कोई हिंदू भी मुस्लिम कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार…’, समाधान निकालने की अपील

सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने की अपील
छिंदवाड़ा ( शिखर दर्शन ) // छत्तीसगढ़ के छिंदवाड़ा जिले के एक गांव में पादरी के शव को दफनाने से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता के पिता, जो हिंदू धर्म में जन्मे थे और बाद में ईसाई धर्म अपनाया, उनके शव को गांव के कब्रिस्तान में दफनाने का विरोध किया गया था। ग्रामीणों के विरोध और धमकियों के कारण मामला अदालत तक पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सौहार्दपूर्ण समाधान की अपील करते हुए कहा, “शव पिछले 15 दिनों से शवगृह में है। इसे सम्मानपूर्वक दफनाने के लिए कोई रास्ता निकाला जाए।” अदालत ने कहा कि यह दुखद है कि एक परिवार को इस तरह के मामले में अदालत का रुख करना पड़ा।
ग्रामीणों का विरोध और याचिकाकर्ता की मांग
याचिकाकर्ता रमेश बघेल ने कोर्ट को बताया कि उनके पिता का अंतिम संस्कार गांव के कब्रिस्तान में ईसाई समुदाय के लिए निर्दिष्ट क्षेत्र में करना चाहते थे। हालांकि, ग्रामीणों ने इसका कड़ा विरोध किया और कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति नहीं दी। यहां तक कि परिवार को उनकी निजी भूमि पर भी शव दफनाने से रोका गया।
सॉलिसिटर जनरल का पक्ष
छत्तीसगढ़ सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मृतक का अंतिम संस्कार ईसाई आदिवासियों के लिए निर्धारित क्षेत्र में किया जाना चाहिए, जो गांव से 20-30 किलोमीटर दूर है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर इस तरह के मामले को अनुमति दी गई, तो कल कोई हिंदू यह तर्क देकर मुस्लिम कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार की मांग कर सकता है।
याचिकाकर्ता का दावा और कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ता के वकील कोलिन गोंजाल्विस ने दलील दी कि गांव का कब्रिस्तान सभी समुदायों के लिए है, और उनके परिवार को वहां दफनाने का अधिकार है। कोर्ट ने इस मामले में दोनों पक्षों को सौहार्दपूर्ण समाधान पर सहमति बनाने की अपील की और कहा कि शव का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।



